Soil of Madhya Pradesh
Madhya Pradesh GK

Soil of Madhya Pradesh

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मृदा

  • मृदा पृथ्वी की सतह की सबसे ऊपरी परत है, जिसमें कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थ पाये जाते हैं।
  • इसका निर्माण चट्टानों के टूटने से निर्मित छोटे एवं महीन कणों, खनिज व जैविक पदार्थों, बैक्टीरिया आदि के मिश्रण से होता है।
  • इस प्रकार, मृदा में केवल खनिज पदार्थों का समूह ही नहीं बल्कि जैव पदार्थ भी विद्यमान होते हैं।
  • मध्य प्रदेश की मृदा को 5 वर्गों में विभाजित किया गया है-
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मृदा का वर्गीकरण

  • काली मृदा
  • जलोढ़ मृदा
  • लाल-पीली मृदा
  • मिश्रित लाल
  • लैटेराइट मृदा एवं काली मृदा

काली मृदा (Black Soil)

  • काली मृदा को रेगुर मृदा ( Regur Soil) या काली कपास मृदा (Black Cotton Soil), करेल तथा चेरनोजम मृदा भी कहते हैं।
  • यह मृदा मध्य प्रदेश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल के 43.44% भाग पर विस्तृत है, जो मालवा के पठार, नर्मदा घाटी, विन्ध्याचल एवं सतपुड़ा घाटियों में स्थित पन्ना, दतिया, ग्वालियर तथा शिवपुरी आदि जिलों में पायी जाती है।
  • काली मृदा का निर्माण दक्कन ट्रैप शैलों के विखण्डन से हुआ है।
  • इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं जैव पदार्थों की मात्रा कम पायी जाती है, जबकि चूना, मैग्नीशियम, पोटाश, एल्युमीनियम एवं लोहा प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
  • लोहे की अधिकता के कारण इसका रंग काला होता है।
  • इस मृदा की प्रकृति क्षारीय (Alkaline) होती है, क्योंकि इसका pH मान 7.5-8.6 के मध्य होता है।
  • यह मृदा ज्वार, कपास, गेहूँ, चना, जौ व सरसों आदि फसलों के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
  • काली मृदा को मुख्यत: दो भागों में वर्गीकृत किया गया है-
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काली मृदा का वर्गीकरण

  • गहरी काली मृदा
  • मध्यम एवं छिछली काली मृदा

1. गहरी काली मृदा (Deep Black Soil)

  • गहरी काली मृदा मध्य प्रदेश के लगभग 16.21 मिलियन हेक्टेयर लाख एकड़ क्षेत्र पर विस्तृत है, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 36.5% भाग है।
  • यह मृदा मुख्य रूप से नर्मदा घाटी, मालवा एवं सतपुड़ा के पठारी क्षेत्रों में पायी जाती है।
  • इस मृदा में चिकनी मृदा की मात्रा 20 से 60% तक मिलती है।
  • यह मृदा गेहूँ, तिलहन, चना तथा ज्वार की कृषि के लिए उपयुक्त है।
  • गहरी काली मृदा का विस्तार मध्य प्रदेश के लगभग 35 जिलों में है, जिनमें होशंगाबाद, हरदा, नरसिंहपुर, शहडोल, उमरिया, जबलपुर, कटनी, सागर, आदि सम्मिलित हैं।

2. मध्यम एवं उथली काली मृदा (Medium and Shallow Soil)

  • यह मृदा मध्य प्रदेश के 3.06 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल पर विस्तृत है जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 6.91% भाग है।
  • इस मृदा का विस्तार मालवा पठार के उत्तरी भाग, निमाड़ क्षेत्र तथा सतपुड़ा क्षेणी के समीपवर्ती क्षेत्रों में है । जिसमें मुख्यत: बैतूल, छिन्दवाड़ा, सिवनी, नरसिंहपुर आदि जिले सम्मिलित हैं।
  • मध्यम काली मृदा का रंग भूरा अथवा हल्का काला होता है तथा उथली काली मृदा का रंग गहरा काला तथा पीला होता है।
  • उथली काली मृदा में 15-20% चिकनी दोमट मृदा पायी जाती है।

In Short

काली मिट्टी

  • निर्माण —– बेसाल्ट चट्टानों के अपरदन से
  • अन्य नाम —– रेगुर मिट्टी, कपासी मिट्टी, चेरनोजम
  • क्षेत्रफल —– सर्वाधिक क्षेत्रफल में लगभग 47%
  • फसल ——कपास, सोयाबीन व मूंगफली
  • विस्तार—— मालवा के पठार व निमाड़ क्षेत्र

अन्य विशेषताएँ-

  • काली मिट्टी स्वयं जोत वाली (SELF PLOUGHING) होती है ।
  • काली मिट्टी का काला रंग टिटेनीफेरस मैग्नेटाइट के कारण होता है ।
  • काली मिट्टी में लोहे और चूने की प्रचुर मात्रा पाई जाती है ।

काली मिट्टी का वर्गीकरण

  • 1. साधारण काली – निमाड़ क्षेत्र
  • 2. गहरी काली – मालवा क्षेत्र
  • 3. छिछली काली – सतपुड़ा क्षेत्र
  • नोट – आंशिक रूप से साधारण काली मिट्टी मालवा के उत्तरी क्षेत्र में भी पाई जाती है ।

जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil)

  • जलोढ़ मृदा को दोमट मृदा भी कहा जाता है।
  • इसका निर्माण हिमालयी तथा प्रायद्वीपीय नदियों द्वारा बहा कर लाये गए अवसादों से हुआ है।
  • इसमें नाइट्रोजन एवं ह्यूमस की मात्रा कम होती है, जबकि चूना, फॉस्फोरिक एसिड, जैव पदार्थों एवं पोटाश की प्रचुरता पायी जाती है।
  • इस मृदा की प्रकृति उदासीन होती है, क्योंकि इसका pH मान 7 होता है।
  • मध्य प्रदेश में इस मृदा का निर्माण चम्बल एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा बहाकर लाए गये कछारों (अवसादों) से होता है, इसलिए इसे कछारी मृदा भी कहते हैं।
  • उर्वरता अधिक होने के कारण यह मृदा खाद्यान्न उत्पादन की दृष्टि से सबसे उपयोगी है।
  • यह मृदा मध्य प्रदेश के लगभग 3.35 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल में पायी जाती है, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 7.57% भाग है।
  • जलोढ़ मृदा राज्य के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित भिण्ड, मुरैना, श्योपुर तथा ग्वालियर जिलों में पायी जाती है।
  • यह मृदा गेहूँ, चना, सरसों, राई, जौ आदि फसलों के उत्पादन लिए उपयुक्त मानी जाती है ।

जलोढ़ मृदा क्षेत्र में मृदा अपरदन (Soil Erosion in Alluvial Soil)

  • मृदा अपरदन का अर्थ है, बाह्य कारकों (वायु, जल या गुरुत्वीय विस्थापन ) द्वारा मृदा कणों का अपने मूल स्थान से पृथक् होकर बह जाना ।
  • मृदा अपरदन को रेंगती हुई मृत्यु (Creeping Death) भी कहा जाता है।
  • मध्य प्रदेश में चम्बल नदी का अपवाह क्षेत्र अर्थात् भिण्ड, श्योपुर, मुरैना, ग्वालियर आदि क्षेत्र मृदा अपरदन से सर्वाधिक प्रभावित हैं।
  • इन क्षेत्रों में अवनालिका अपरदन (Gully erosion) के कारण खोह-खड्डों या उत्खात भूमि का निर्माण हुआ है।

मृदा अपरदन को रोकने के लिए प्रभावी उपाय

  • अवनालिकाओं का भराव एवं ढलाव के सहारे वेदिकाओं का निर्माण करना ।
  • बीहड़ क्षेत्रों का समतलन और इन क्षेत्रों में मिट्टी को संगठित रखने वाले पौधों का रोपण करना ।
  • मृदा अपरदन से प्रभावित क्षेत्रों में वृक्षारोपण करना और अत्यधिक पशुचारण पर प्रतिबंध लगाना ।

In Short

जलोढ़ मिट्टी

  • निर्माण —– नदियों के अवसाद जमने से
  • अन्य नाम —– दोमट मिट्टी
  • क्षेत्रफल ——– म.प्र. के लगभग 3% भाग पर
  • अधिकता ——- पोटाश की अधिकता के कारण यह मिट्टी सर्वाधिक उपजाऊ होती है।
  • फसल ——- गेहूँ, गन्ना और सरसो
  • विस्तार——– चम्बल व नर्मदा घाटी क्षेत्र

लाल-पीली मृदा (Red-Yellow Soil)

  • लाल-पीली मृदा का निर्माण प्राचीन रवेदार और रूपांतरित चट्टानों (Metamorphic Rocks) के अपरदन से हुआ है।
  • मध्य प्रदेश में यह मृदा राज्य के कुल क्षेत्रफल के लगभग 36 प्रतिशत भू-भाग पर विस्तृत है, जो मुख्यतः बुंदेलखण्ड एवं बघेलखण्ड क्षेत्रों विशेषकर मण्डला, बालाघाट, सीधी एवं शहडोल जिलों में पायी जाती है।
  • इस मृदा में लाल रंग फेरिक ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण तथा पीला रंग फेरिक ऑक्साइड की जल से क्रिया के कारण होता है।
  • यह मृदा धान की कृषि के लिए सबसे उपयुक्त है।
  • यह अम्लीय प्रकृति की मृदा होती है।
  • इसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एंव ह्यूमस की कमी होती है।
  • यह मृदा प्राय: अनुर्वर (बंजर) भूमि के रूप में पायी जाती है।

In Short

लाल-पीली मिट्टी

  • निर्माण —- ग्रेनाइड व नीस चट्टानों के अपरदन से
  • अन्य नाम —- चलका और डोरसा
  • क्षेत्रफल —— लगभग 33% भाग पर
  • फसल ———धान
  • विस्तार ——– पूर्वी मध्यप्रदेश (बघेलखण्ड )
  • विशेष—— मिट्टी का लाल रंग फेरिक (आयरन) ऑक्साइड के कारण होता है ।
  • मिट्टी का पीला रंग फेरिक ऑक्साइड के जलयोजन (Hydration) के कारण होता है ।

लैटेराइट मृदा (Laterite Soil)

  • लैटेराइट मृदा एक चट्टानी मृदा है, इसलिए इसमें चट्टानों के कण अधिक पाए जाते हैं।
  • इस मृदा को लाल बलुई मृदा तथा स्थानीय स्तर पर भाटा भी कहा जाता है।
  • इसका निर्माण मानसूनी जलवायु की आर्द्रता एवं शुष्कता में क्रमिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप उत्पन्न विशिष्ट परिस्थितियों में होता है। इसमें आयरन एवं सिलिका की बहुलता होती है।
  • इस मृदा में ह्यूमस की मात्रा कम पायी जाती है, क्योंकि इन क्षेत्रों में तापमान व वर्षा की मात्रा अधिक होने के कारण क्षारीय तत्व व ह्यूमस जल के साथ घुलकर नीचे की परतों में चले जाते हैं।
  • यह मृदा अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पायी जाती है, जो बागानी फसलों (चाय एवं कॉफी) के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
  • यह मृदा छिन्दवाड़ा और बालाघाट जिलों के अधिकांश भू-भाग पर विस्तृत है।

In Short

लेटेराइट मिट्टी

  • अन्य नाम —– लाल-भूरी मिट्टी, भट्टा मिट्टी
  • क्षेत्रफल ——- म.प्र. के लगभग 2.5% भाग
  • कमी —- घूमस
  • फसल —— ज्वार, मक्का, बाजरा
  • विस्तार —–सतपुड़ा क्षेत्र (छिंदवाड़ा, बैतूल) व मध्य भारत (मंदसौर, नीमच, श्योपुर)
  • विशेष—- यह मिट्टी सबसे कम उपजाऊ होती है ।

मिश्रित लाल एवं काली मृदा (Mixed Red and Black Soil)

  • इस मृदा को लाल – रेतीली मृदा के नाम से भी जाना जाता है, जो सभी प्रकार की मिट्टियों का मिश्रण है।
  • यह मृदा नीस व ग्रेनाइट चट्टानों के विखण्डन से निर्मित है।
  • मिश्रित मृदा मध्य प्रदेश के 8.11 मिलियन हेक्टयेर क्षेत्रफल में पायी जाती है, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 18.30% भाग है।
  • इस मृदा का विस्तार मंडला, डिंडोरी, बालाघाट, रीवा, सतना, पन्ना छतरपुर, टीकमगढ़, शिवपुरी, गुना आदि जिलों में है।
  • मध्य प्रदेश में यह मृदा लाल-पीली मृदा तथा काली मृदा के क्षेत्रों में मिश्रित रूप में तथा बुन्देलखंड के कुछ भागों में रेत और बालू के साथ मिश्रित रूप में पायी जाती है।
  • मिश्रित मृदा ज्वार और बाजरा जैसे मोटे अनाजों की कृषि के लिए उपयुक्त होती है।

In Short

मिश्रित मिट्टी

  • क्षेत्रफल —– म.प्र. के लगभग 10% भाग पर
  • अधिकता —– आयरन की प्रचुरता
  • फसल —— गेहूँ, धान व तिल
  • विस्तार —— बुंदेलखंड व विंध्य क्षेत्र

Facts to Know—

  • मध्यप्रदेश आर्थिक समीक्षा 2022-23 —-भारत की कुल जैविक खेती में मध्यप्रदेश का योगदान 40% से अधिक है
प्राकृतिक क्षेत्र में मृदा वितरण

(प्राकृतिक क्षेत्र)———- (मृदा का वितरण)

  1. मालवा पठार————गहरी काली मृदा
  2. बघेलखंड पठार——–लाल-पीली मृदा
  3. सतपुड़ा पठार———छिछली काली मृदा
  4. निमाड़ क्षेत्र——— साधारण काली मृदा
  5. मध्यभारत पठार——कछारी और जलोढ़
फसलों के लिए उपयुक्त मृदा

फसल—————- उपयुक्त मृदा

  1. कपास, मूंगफली——– काली
  2. गेहूँ, गन्ना————–जलोढ़
  3. चावल—————लाल-पीली
  4. मक्का, कॉफी——–लैटेराइट
मिट्टी में रंग के कारण

  1. काली मिट्टी (काला रंग) —— टिटेनीफेरस मैग्नेटाइट
  2. लाल मिट्टी (लाल रंग) ——– फेरिस ऑक्साइड
  3. लेटराइट (भूरा – सफेद रंग) —- केयोलिन
मिट्टी बचाओ आंदोलन

  • मिट्टी बचाओ आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1977 में हुई थी ।
  • यह आंदोलन मध्य प्रदेश में तवा बांध के कारण जलभराव और लवणता के खिलाफ शुरू किया गया था ।
अवनालिका अपरदन ( Gully Erosion)

  • इस प्रकार के अपरदन में मृदा में बड़ी व अधिक गहरी नालियाँ बन जाती हैं, इन खंडरो को बीहड़ कहा जाता है ।
  • उदाहरण —- चम्बल नदी के द्वारा अवनालिका अपरदन देखने को मिलता है।
  • मध्यप्रदेश में सर्वाधिक बीहड़ प्रभावित जिले मुरैना, भिंड एवं श्योपुर है ।
मृदाओं के अन्य नाम

  • काली मिट्टी—–रेगुर मिट्टी, कपासी मिट्टी, चेरनोजम
  • लाल-पीली मृदा—– चलका, डोरसा
  • जलोढ़ मृदा———- दोमट मिट्टी
  • लैटराइट मृदा——– -लाल-भूरी या सफेद मृदा
अम्लीय मृदा और क्षारीय मृदा

अम्लीय मृदा –

  • अधिक वर्षा के कारण, मृदा की ऊपरी सतह से क्षारीय तत्व जैसे- कैल्शियम, मैग्नीशियम आदि पानी में बह जाते हैं जिसके परिणाम स्वरुप मृदा का पी. एच. मान. 07 से कम हो जाता है, ऐसी मृदा को हम अम्लीय मृदा कहते हैं ।
  • अम्लीय मृदा में हाड्रोजन (H+) आयनों की सान्द्रता बढ़ जाती है ।
  • अम्लीय मृदा के समाधान के लिए चूना का अधिक प्रयोग किया जाता है ।

क्षारीय मृदा –

  • कम वर्षा के कारण, क्षारीय तत्व जैसे कैल्शियम, मैग्नीशियम व सोडियम आदि घुलनशील होकर पानी के साथ नष्ट नहीं होते और ऊपरी सतह पर एकत्र हो जाते है, जिसके परिणाम स्वरुप मृदा का पी. एच. मान. 07 से अधिक हो जाता है, ऐसी मृदा को हम क्षारीय मृदा कहते हैं ।
  • क्षारीय मृदा में (OH-) आयनों की सान्द्रता बढ़ जाती है ।
  • क्षारीय मृदा के समाधान के लिए जिप्सम व पायराइट का अधिक प्रयोग किया जाता है ।

Recently Asked

MPPSC 2023

73. Which of the following characteristics is not correct in reference to the black soil of Madhya Pradesh?

(A) Black soil is also known as cotton soil.

(B) Black soil is highly retentive of moisture.

(C) Black soil has high sand content.

(D) Its structure is cloddish but occasionally friable.

73. निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता मध्य प्रदेश की काली मिट्टी के संदर्भ में सही नहीं है ?

(A) काली मिट्टी को कपास की मिट्टी के रूप में भी जाना जाता है ।

(B) इसमें नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है ।

(C) काली मिट्टी में रेत की मात्रा अधिक होती है ।

(D) इसकी संरचना गांठदार लेकिन कभी-कभी भुरभुरी होती है ।

MPPSC 2022

71. Consider the following: statements regarding soils of Madhya Pradesh:

1. Red and yellow soils are there in Baghelkhand.

2. Red and yellow soils have high fertility.

3. Deep black soil is found in Malwa Plateau.

4. Alluvial soil is found in North-Western part of Madhya Pradesh.

Which of the above statements is/are correct?

(A) Only 1 and 2 (B) Only 2 (C) Only 2 and 4 (D) Only 1, 3 and 4.

71. मध्यप्रदेश की मिट्टी के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :

1. बघेलखंड में लाल व पीली मिट्टी पाई जाती है ।

2. लाल एवं पीली मिट्टी में उर्वरता अधिक होती है ।

3. मालवा पठार में गहरी काली मिट्टी पाई जाती है ।

4. मध्यप्रदेश के उत्तरी-पश्चिमी भाग में जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है ।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा /से कथन सही है / हैं ?

(A) केवल 1 और 2 (B) केवल 2 (C) केवल 2 और 4 (D) केवल 1, 3 और 4

MPPSC 2021

5. मध्यप्रदेश के किस क्षेत्र में काली मिट्टी नहीं पायी जाती है ?

(A) मालवा का पठार (B) नर्मदा घाटी (C) बघेलखण्ड (D) सतपुड़ा श्रेणी

5. In which region of Madhya Pradesh, the black soils are not found?

(A) Malwa Plateau (B) Narmada Valley (C) Baghelkhand (D) Satpura range

महत्वपूर्ण प्रश्न

1. निम्न में से कौन सी मृदा सर्वाधिक उपजाऊ है ?

(A) काली मृदा (B) लाल-पीली मृदा (e) जलोढ़ मृदा (D) लैटेराइट मृदा

2. रेगुर या कपासी मृदा किसे कहते हैं?

(A) काली मृदा (B) लाल मृदा (C) जलोढ़ मृदा (D) लैटेराइट मृदा

3. मृदा अपरदन को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है?

(A) मृदा ह्यूमस (B) रेंगती हुई मृत्यु (C) मृदा संरक्षण (D) इनमें से कोई नहीं

4. मध्य प्रदेश के किस जिले में मृदा अपरदन एक गंभीर समस्या है ?

(A) श्योपुर (C) मुरैना (B) भिण्ड (D) उपरोक्त सभी

5. मध्य प्रदेश में कौन सी मृदा सर्वाधिक पाई जाती है ?

(A) लाल-पीली मृदा (B) दोमट ( जलोढ़) मृदा (C) लैटेराइट मृदा (D) काली मृदा

6. जलोढ़ मृदा का निर्माण किस प्राकृतिक क्रिया के द्वारा होता है?

(A) बाढ़ से (B) भूकम्प से (C) ज्वालामुखी उद्गार से (D) इनमें से कोई नहीं

7. लाल-पीली मृदा का पीला रंग किसके कारण होता है?

(A) लोहे के ऑक्साइड (B) फेरिक ऑक्साइड (C) जिंक ऑक्साइड (D) A और B दोनों

8. मध्य प्रदेश के मंडला एवं बालाघाट जिलों में पायी जाने वाली लाल-पीली मृदा किस फसल के लिए उपयुक्त है ?

(A) कपास (B) ज्वार (C) बागानी फसल (D) धान

9. सम्पूर्ण मध्य प्रदेश में काली मृदा का विस्तार कितने प्रतिशत भू-भाग पर पाया जाता है ?

(A) 42.6% (C) 43.44% (B) 40.0% (D) 48.8%

10. मालवा के पठार में कौन सी मृदा पायी जाती है?

(A) जलोढ़ मृदा (C) लाल-पीली मृदा (B) मिश्रित मृदा (D) काली मृदा

11. खाद्यान्न उत्पादन की दृष्टि से सर्वाधिक उपजाऊ मृदा है-

(A) जलोढ़ मृदा (B) काली मृदा (C) लाल-पीली मृदा (D) लैटेराइट मृदा

12. मध्य प्रदेश की मृदा को कितने वर्गों में वर्गीकृत किया गया है ?

(A) 3 (C) 4 (B) 5 (D) 6

13. मध्य प्रदेश के चम्बल क्षेत्र में मृदा अपरदन का प्रमुख कारण है-

(A) वायु अपरदन (B) अवनालिका अपरदन (C) गुरुत्वीय अपरदन (D) मरुस्थलीकरण

14. किस मृदा को करैल या चेरनोजम भी कहा जाता है?

(A) काली मृदा (B) जलोढ़ मृदा (D) लैटेराइट मृदा (C) लाल-पीली मृदा

THE END

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